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सय्यिद ने कर्बला में वादे निभा दिए हैं / Syed Ne Karbala Mein Wade Nibha Diye Hain

सय्यिद ने कर्बला में वा'दे निभा दिए हैं दीन-ए-मुहम्मदी के गुलशन खिला दिए हैं बोले हुसैन, मौला ! तेरी रिज़ा की ख़ातिर इक एक कर के मैं ने हीरे लुटा दिए हैं दीन-ए-नबी पे वारी अकबर ने भी जवानी 'अब्बास ने भी अपने बाज़ू कटा दिए हैं ज़ैनब के बाग़ में भी दो फूल थे महकते ज़ैनब ने वो भी दोनों राह-ए-ख़ुदा दिए हैं ज़हरा के नाज़-पाले, फूलों पे सोने वाले कर्बल की ख़ाक पर वो हीरे लुटा दिए हैं सरकार होंगे राज़ी उस से भी सुन लो, हाफ़िज़ ! दो-चार आँसू रो कर जिस ने बहा दिए हैं ना'त-ख़्वाँ: प्रोफ़ेसर अब्दुर्रउफ़ रूफ़ी असद रज़ा अत्तारी हाफ़िज़ अहसन क़ादरी sayyid ne karbala me.n waa'de nibha diye hai.n deen-e-muhammadi ke gulshan khila diye hai.n bole husain, maula ! teri riza ki KHaatir ik ek kar ke mai.n ne heere luTa diye hai.n deen-e-nabi pe waari akbar ne bhi jawaani 'abbaas ne bhi apne baazu kaTa diye hai.n zainab ke baaG me.n bhi do phool the mahakte zainab ne wo bhi dono.n raah-e-KHuda diye hai.n zahra ke naaz-paale, phoolo.n pe sone waale karbal ki KHaak par...

मेराज की रतिया धूम ये थी इक राज दुलारा आवत है / Meraj Ki Ratiya Dhoom Ye Thi Ek Raj Dulara Aawat Hai

मे'राज की रतिया धूम ये थी, इक राज दुलारा आवत है लौलाक का सेहरा सर सोहत, वो अहमद प्यारा आवत है हूरों ने कहा जब बिस्मिल्लाह, ग़िलमाँ ने पुकारा इल्लल्लाह ख़ुद रब ने कहा माशा-अल्लाह महबूब हमारा आवत है जिब्रील-ए-अमीं ये कहते चले, ऐ 'अर्शियो ! तुमरे भाग जगे ता'ज़ीम को सब हो जाओ खड़े, सरदार तुम्हारा आवत है यासीं की चमक है दातन में, ताहा का करिश्मा आँखन में वल-फ़ज्र का जल्वा गालन में, वो 'अर्श का तारा आवत है मा-ज़ाग़ का कजला नैन भरे, वश्शम्स का बुटना मुख पे मले है मीम का घूँघट सेहरे तले, वो रब का सँवारा आवत है धरती से उठा आफ़ाक़ चढ़ा, मुमताज़ ! ये ग़ुल था चारों तरफ़ लो हक़ से मिलने सल्ले-'अला सरदार हमारा आवत है शायर: मुमताज़ गंगोही ना'त-ख़्वाँ: प्रोफ़ेसर अब्दुल रऊफ़ रूफ़ी हिबा मुज़म्मिल क़ादरी me'raaj ki ratiya dhoom ye thi ik raaj dulaara aawat hai laulaak ka sehra sar sohat wo ahmad pyaara aawat hai hooro.n ne kaha jab bismillah Gilmaa.n ne pukaara illallah KHud rab ne kaha maasha-allah mahboob hamaara aawat hai jibreel-e-amee.n ye kehte chale...

ऐ मदीने के ताजदार तुझे अहल-ए-ईमाँ सलाम कहते हैं / Aye Madine Ke Tajdar Tujhe Ahl-e-Imaan Salam Kehte Hain

ऐ मदीने के ताजदार ! तुझे अहल-ए-ईमाँ सलाम कहते हैं तेरे 'उश्शाक़, तेरे दीवाने जान-ए-जानाँ ! सलाम कहते हैं जो मदीने से दूर रहते हैं हिज्र-ओ-फ़ुर्क़त का रंज सहते हैं वो तलबगार-ए-दीद रो रो कर ऐ मेरी जाँ ! सलाम कहते हैं जिन को दुनिया के ग़म सताते हैं ठोकरें दर-ब-दर की खाते हैं ग़म-नसीबों के चारा-गर ! तुम को वो परेशाँ सलाम कहते हैं दूर दुनिया के रंज-ओ-ग़म कर दो और सीने में अपना ग़म भर दो उन को चश्मान-ए-तर 'अता कर दो जो भी, सुल्ताँ ! सलाम कहते हैं जो तेरे 'इश्क़ में तड़पते हैं हाज़री के लिए तरसते हैं इज़्न-ए-तयबा की आस में, आक़ा ! वो पुर-अरमाँ सलाम कहते हैं तेरे रौज़े की जालियों के पास आक़ा ! रहम-ओ-करम की ले कर आस कितने दुखियारे रोज़ आ आ के शाह-ए-ज़ीशाँ ! सलाम कहते हैं आरज़ू-ए-हरम है सीने में अब तो बुलवाइए मदीने में तुझ से तुझ ही को माँगते हैं जो वो मुसलमाँ सलाम कहते हैं रुख़ से पर्दे को अब उठा दीजे अपने क़दमों से अब लगा लीजे आह ! जो नेकियों से हैं यकसर ख़ाली दामाँ सलाम कहते हैं आप 'अत्तार ! क्यूँ परेशाँ हैं ? बद से बद-तर भी ज़ेर-ए-दामाँ हैं उन पे रहमत वो ख़ास कर...

या नबी सब करम है तुम्हारा ये जो वारे नियारे हुए हैं / Ya Nabi Sab Karam Hai Tumhara Ye Jo Ware Niyare Hue Hain

या नबी ! सब करम है तुम्हारा, ये जो वारे नियारे हुए हैं अब कमी का तसव्वुर भी कैसा, जब से मँगते तुम्हारे हुए हैं या नबी ! सब करम है तुम्हारा, ये जो वारे नियारे हुए हैं कोई मुँह न लगाता था हम को, पास तक न बिठाता था हम को जब से थामा है दामन तुम्हारा, दुनिया वाले हमारे हुए हैं या नबी ! सब करम है तुम्हारा, ये जो वारे नियारे हुए हैं उन के दरबार से जब भी मैं ने, पंजतन के वसीले से माँगा मुझ को ख़ैरात फ़ौरन मिली है, ख़ूब मेरे गुज़ारे हुए हैं या नबी ! सब करम है तुम्हारा, ये जो वारे नियारे हुए हैं दूर होने को है अब ये दूरी, उन की चौखट पे होगी हुज़ूरी ख़्वाब में मुझ को आक़ा के दर से हाज़री के इशारे हुए हैं या नबी ! सब करम है तुम्हारा, ये जो वारे नियारे हुए हैं देख कर उन के रौज़े के जल्वे, मुझ को महसूस ये हो रहा था जैसे मंज़र ये सारे के सारे आसमाँ से उतारे हुए हैं या नबी ! सब करम है तुम्हारा, ये जो वारे नियारे हुए हैं हश्र के रोज़ जब मेरे आक़ा उम्मती की शफ़ा'अत करेंगे रब कहेगा, उन्हें मैं ने बख़्शा जो दिवाने तुम्हारे हुए हैं या नबी ! सब करम है तुम्हारा, ये जो वारे नियारे हुए हैं ख़्वाजा अजमे...

दुनिया के ऐ मुसाफ़िर मंज़िल तेरी क़बर है / Duniya Ke Aye Musafir Manzil Teri Qabar Hai

दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है जब से बनी है दुनिया लाखों-करोड़ों आए बाक़ी रहा न कोई, मिट्टी में सब समाए इस बात को न भूलो, सब का यही हशर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है आँखों से तू ने अपनी देखे कई जनाज़े हाथों से तू ने अपने दफ़नाए कितने मुर्दे अंजाम से तू अपने क्यूँ इतना बे-ख़बर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है ये 'आलिशान बंगले किसी काम के नहीं हैं महलों में सोने वाले मिट्टी में सो रहे हैं दो गज़ ज़मीं का टुकड़ा छोटा सा तेरा घर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है मख़मल पे सोने वाले मिट्टी में सो रहे हैं शाह-ओ-गदा यहाँ पर सब एक हो रहे हैं दोनों हुए बराबर, ये मौत का असर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है मिट्टी के पुतले ! तू ने मिट्टी में है समाना इक दिन यहाँ तू आया, इक दिन यहाँ से जाना रुकना नहीं यहाँ पर, जारी तेरा सफ़र है दुनिया के...

जो मदीने हम भी जाते तो कुछ और बात होती / Jo Madine Hum Bhi Jaate To Kuchh Aur Baat Hoti

जो मदीने हम भी जाते तो कुछ और बात होती कभी लौट कर न आते तो कुछ और बात होती मय-ए-'इश्क़-ए-मुस्तफ़ा हम वहीं पी के मस्त रहते सर-ए-हश्र लड़खड़ाते तो कुछ और बात होती मेरी ज़ीस्त के 'अनासिर दर-ए-मुस्तफ़ा पे चल के मेरा साथ छोड़ जाते तो कुछ और बात होती मेरे आँसुओं पे ना-हक़ न सितारो मुस्कुराओ ये जो तयबा देख पाते तो कुछ और बात होती ये सितारों का तबस्सुम है नज़र-नवाज़ लेकिन जो हुज़ूर मुस्कुराते तो कुछ और बात होती मुझे ज़हर देने वाले बड़े कम-नज़र हैं, आक़ा ! तेरे नाम पर पिलाते तो कुछ और बात होती ये हवा के मस्त झोंके जो इरम से आ रहे हैं यही तयबा हो के आते तो कुछ और बात होती ये फ़रोग़-ए-'इल्म-ओ-दानिश, ये मता-ए-रंग-ए-'आलम यहाँ मुस्तफ़ा न आते तो कुछ और बात होती ये जो ना'त-ए-पाक, बेकल ! सर-ए-बज़्म पढ़ रहे हो कहीं तयबा में सुनाते तो कुछ और बात होती शायर: बेकल उत्साही ना'त-ख़्वाँ: प्रोफ़ेसर अब्दुर्रउफ़ रूफ़ी साबिर रज़ा अज़हरी सुरत jo madine ham bhi jaate to kuchh aur baat hoti kabhi lauT kar na aate to kuchh aur baat hoti mai-e-'ishq-e-mustafa ham wahi.n pee ke m...

मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम / Meetha Meetha Hai Mere Muhammad Ka Naam

मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम उन पे लाखों करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम जिस ने आ के सँवारा है दारैन को जिस की रहमत ने ढाँपा है कौनैन को जिस के दम से ही ये रौनकें हैं तमाम उन पे लाखों करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम ला-मकाँ के बने हैं वोही तो मकीं जिन के ना'लैन को चूमे 'अर्श-ए-बरीं जो ख़ुदा से हुए 'अर्श पर हम-कलाम उन पे लाखों करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम वक़्त लाए ख़ुदा, जाएँ दरबार पर और खड़े हो के रौज़ा-ए-सरकार पर पेश मिल कर करें हम दुरूद-ओ-सलाम उन पे लाखों करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम इक ख़ुदा की रज़ा जिस का मक़्सूद था ज़ुल्म सहता रहा, शुक्र करता रहा जिस के सब्र-ओ-तहम्मुल के चर्चे हैं आम उन पे लाखों करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम मीठा मीठा है मेरे मुहम्मद का नाम वोही हसनी-हुसैनी चमन के हैं फूल नूर-ए-मौला-...

आने वालो ये तो बताओ शहर-ए-मदीना कैसा है | देख के जिस को जी नहीं भरता शहर-ए-मदीना ऐसा है / Aane Waalo Ye To Bataao Shehr-e-Madina Kaisa Hai | Dekh Ke Jis Ko Jee Nahin Bharta Shehr-e-Madina Aisa Hai

आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है सर उन के क़दमों में रख कर, झुक कर जीना कैसा है देख के जिस को जी नहीं भरता, शहर-ए-मदीना ऐसा है आँखों को जो ठंडक बख़्शे, गुंबद-ए-ख़ज़रा ऐसा है आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है गुंबद-ए-ख़ज़रा के साए में बैठ के तुम तो आए हो उस साए में रब के आगे सज्दा करना कैसा है आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है मैं भी चूम के आज आया हूँ उन महकती गलियों को जो कुछ देखा उन गलियों में, कहीं न देखा ऐसा है देख के जिस को जी नहीं भरता, शहर-ए-मदीना ऐसा है दिल, आँखें और रूह तुम्हारी लगती है सैराब मुझे दर पे उन के बैठ के आब-ए-ज़मज़म पीना कैसा है आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है हम मेहमान बने थे उन के, 'अर्श पे जो मेहमान हुए क्यूँ न क़िस्मत पर हो नाज़ाँ, जिन का आक़ा ऐसा है देख के जिस को जी नहीं भरता, शहर-ए-मदीना ऐसा है दीवानो ! आँखों से तुम्हारी इतना पूछ तो लेने दो वक़्त-ए-दु'आ रौज़े पे उन के आँसू बहाना कैसा है आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है मिम्बर-ए-पाक-ए-रसूल भी देखा, देखा ख़ास मुसल्ला भी हरम शरीफ़ का हर मंज़र ही नज़र म...

शाह-ए-मदीना शाह-ए-मदीना / Shah-e-Madina Shah-e-Madina

शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! दो-आलम के वाली !  सारे नबी हैं तेरे दर के सवाली शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! जल्वे हैं सारे तेरे ही दम से आबाद आलम तेरे करम से बाक़ी हर इक शय नक़्श-ए-ख़याली सारे नबी हैं तेरे दर के सवाली शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! तेरे लिए ही दुनिया बनी है नीले फ़लक की चादर तनी है तू अगर न होता दुनिया थी ख़ाली सारे नबी हैं तेरे दर के सवाली शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! मज़हब है तेरा सब की भलाई मस्लक है तेरा मुश्किल-कुशाई देख अपनी उम्मत की ख़स्ता-हाली सारे नबी हैं तेरे दर के सवाली शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! शाह-ए-मदीना ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! नात-ख़्वाँ: अब्दुर्रउफ रूफ़ी

ख़ुदा की अज़्मतें क्या हैं, मुहम्मद मुस्तफ़ा जाने / Khuda Ki Azmaten Kya Hain, Muhammad Mustafa Jaane

ख़ुदा की अज़्मतें क्या हैं, मुहम्मद मुस्तफ़ा जाने मक़ाम-ए-मुस्तफ़ा क्या है, मुहम्मद का ख़ुदा जाने सदा करना तो मेरे बस में था मैंने सदा कर दी वो क्या देंगे, मैं क्या लूँगा, सख़ी जाने, गदा जाने ख़ुदा की अज़्मतें क्या हैं, मुहम्मद मुस्तफ़ा जाने मक़ाम-ए-मुस्तफ़ा क्या है, मुहम्मद का ख़ुदा जाने कहा जिब्रील ने सिदरा तलक मेरी रसाई है हैं कितनी मंजिलें आगे, नबी जाने, ख़ुदा जाने ख़ुदा की अज़्मतें क्या हैं, मुहम्मद मुस्तफ़ा जाने मक़ाम-ए-मुस्तफ़ा क्या है, मुहम्मद का ख़ुदा जाने मेरी मिट्टी मदीन-ए-पाक की रह में बिछा देना कहाँ ले जाती है इस को मदीने की हवा जाने ख़ुदा की अज़्मतें क्या हैं, मुहम्मद मुस्तफ़ा जाने मक़ाम-ए-मुस्तफ़ा क्या है, मुहम्मद का ख़ुदा जाने मुझे तो सुर्ख़-रू होना है आक़ा की निग़ाहों में ज़माने का है क्या नासिर ! भला जाने, बुरा जाने ख़ुदा की अज़्मतें क्या हैं, मुहम्मद मुस्तफ़ा जाने मक़ाम-ए-मुस्तफ़ा क्या है, मुहम्मद का ख़ुदा जाने नातख्वां: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी